{"product_id":"सरहद-पार-का-बसेरा-sarhad-paar-ka-basera-रक्त-रेखाएं-और-रोटी-का-इतिहास","title":"सरहद पार का बसेरा | Sarhad Paar Ka Basera : रक्त, रेखाएं और रोटी का इतिहास","description":"\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eAbout The Book\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eएक रात। बारह भाई। और एक माँ, जिसने अपने बेटों को बचाने के लिए सब कुछ क़ुर्बान कर दिया।\u003cbr\u003e१९५० के दशक में, दक्षिण चीन के एक भूले-बिसरे पहाड़ी गाँव से — जहाँ हक्का समुदाय सदियों से अपनी अलग भाषा और पहचान के साथ रहता आया था — बारह भाई एक काली रात अंधेरे में निकल पड़ते हैं, बिना यह जाने कि वे अपनी माँ को आख़िरी बार देख रहे हैं। समंदर पार करके, एक अनजान बंदरगाह पर लुटकर, वे दार्जिलिंग की पहाड़ियों में पहुँचते हैं — जहाँ शून्य से शुरू करके, अपनी मेहनत के दम पर, वे एक साम्राज्य खड़ा करते हैं।\u003cbr\u003eपर हर साम्राज्य की अपनी क़ीमत होती है। समृद्धि आती है, फिर बिखराव भी। पीढ़ियाँ बदलती हैं, शहर बदलता है — और दशकों बाद, एक अकाउंटेंट अपने परिवार की जड़ों को खोजने उसी गाँव लौटता है, जहाँ से सब कुछ शुरू हुआ था। वहाँ उसे वह सच पता चलता है जो जो उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था — एक दीवार, कुछ पुराने निशान, और एक परिवार का ऐसा बलिदान जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।\u003cbr\u003eयह कहानी है विस्थापन की, पहचान की, भाषा की — और आख़िर में, इस फ़ैसले की कि असली विरासत ज़मीन में नहीं, बल्कि उस ज़ुबान और उस स्मृति में बसती है जिसे हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने साथ लेकर चलते हैं।\u003cbr\u003eएक सच्ची मुलाक़ात से प्रेरित, CA प्रबीन झा की यह पहली औपन्यासिक रचना, एक परिवार की गाथा के बहाने, हर उस इंसान की कहानी कहती है जिसने कभी सरहद पार करके भी अपनी जड़ों को ज़िंदा रखा।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eAbout The Author\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eप्रबीन झा पेशे से एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं और वर्तमान में कोलकाता में एक प्रतिष्ठित सीए फर्म में पार्टनर के रूप में कार्यरत हैं। वित्तीय आंकड़ों, ऑडिट फाइलों और कॉर्पोरेट जगत की व्यस्तताओं के बीच, उनके भीतर हमेशा एक संवेदनशील कथाकार सांस लेता रहा है। प्रबीन जी को ऐतिहासिक घटनाओं, पुराने दौर के संघर्षों और इंसानी रिश्तों के गहरे ताने-बाने पर कहानियाँ बुनना बेहद पसंद है।\u003cbr\u003e'सरहद पार का बसेरा' उनका पहला उपन्यास है। इस किताब की नींव तब पड़ी जब एक ऑडिट के सिलसिले में उनकी मुलाकात कोलकाता के चीनी-भारतीय (हक्का) समुदाय के एक सदस्य से हुई। उस एक बातचीत ने उनके भीतर विस्थापन, पहचान और अस्तित्व के दर्द को इस कदर जगाया कि यह उपन्यास कागज़ पर उतर आया। यह कहानी आंकड़ों से परे, इतिहास के मलबे में दफ़न एक बेनाम परिवार के त्याग और उनकी अटूट जड़ों की एक मर्मस्पर्शी गवाही है।\u003c\/p\u003e","brand":"Classic Shelf","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":67582600708333,"sku":null,"price":242.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0765\/3520\/2029\/files\/1shopifyfrontcover_37052c84-f3e8-414d-90d4-3790bfc5d614.jpg?v=1790415149","url":"https:\/\/classicshelf.in\/products\/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-sarhad-paar-ka-basera-%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8","provider":"Classic Shelf","version":"1.0","type":"link"}