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लौटाऊँ या लौट आऊँ

लौटाऊँ या लौट आऊँ

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About The Book

लौटाऊँ या लौट आऊँ देवेन्द्र पंत की संवेदनशील और भावप्रधान काव्य-कृति है, जिसमें जीवन, प्रेम, स्मृतियों, रिश्तों और मनुष्य के भीतर चलने वाले भावनात्मक द्वंद्व को सहज एवं मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि उन अनकहे एहसासों की यात्रा है, जिन्हें मनुष्य अक्सर अपने भीतर संजोए रखता है।

कृति का शीर्षक स्वयं एक गहरे प्रश्न को सामने रखता है—क्या बीती हुई चीज़ों को लौटाया जा सकता है, या फिर मनुष्य को स्वयं ही उन स्मृतियों और संबंधों की ओर लौटना पड़ता है? इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द कविताएँ जीवन के विभिन्न रंगों को स्पर्श करती हैं। कहीं प्रेम की कोमलता है, कहीं बिछड़ने की पीड़ा, कहीं बीते समय की कसक, तो कहीं वर्तमान को समझने और स्वीकार करने की कोशिश।

देवेन्द्र पंत की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय है। उनकी कविताएँ पाठक को किसी दूर की दुनिया में नहीं ले जातीं, बल्कि उसके अपने अनुभवों, रिश्तों और स्मृतियों के करीब लाती हैं। यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो कविता में केवल शब्द नहीं, बल्कि अपने मन की आवाज़, अपने अतीत की परछाइयाँ और जीवन की सच्ची अनुभूतियाँ तलाशते हैं।

About The Author

देवेन्द्र पंत का जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने के बाद लंबे समय तक सरकारी सेवा में कार्य किया और सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वयं को पूरी तरह लेखन एवं साहित्य-सृजन के लिए समर्पित कर दिया। जीवन के विविध अनुभवों, सामाजिक परिवेश और मानवीय संबंधों की गहरी समझ ने उनकी रचनात्मक दृष्टि को समृद्ध किया है। उनकी लेखनी में जीवन की सहज अनुभूतियों, समाज की सच्चाइयों और मानवीय संवेदनाओं का सरल, मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है। उनकी भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और भावनात्मक है, जो पाठकों से सीधे संवाद स्थापित करती है। उनकी प्रमुख रचनाओं में गीत और ग़ज़ल, सुलगता हुआ अंधेरा तथा बांग्ला भाषा में रचित बुलबुल चलो एईबार शामिल हैं। हिंदी और बांग्ला दोनों भाषाओं में उनका साहित्यिक जुड़ाव उनकी बहुआयामी रचनात्मकता को दर्शाता है। प्रस्तुत कृति लौटाऊँ या लौट आऊँ भी उनके संवेदनशील और अनुभवसमृद्ध लेखन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस रचना के माध्यम से लेखक जीवन, संबंधों, स्मृतियों और मनुष्य के भीतर चलने वाले भावनात्मक द्वंद्व को सहज शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन को पूर्णतः समर्पित देवेन्द्र पंत निरंतर साहित्य-सृजन के माध्यम से जीवन और समाज के विविध पहलुओं को अपनी विशिष्ट दृष्टि से प्रस्तुत कर रहे हैं।

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