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अनिमेष अनंत (Animesh Anant)

अनिमेष अनंत (Animesh Anant)

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About the Book

क्या कोई इंसान अपनी मासूमियत को खोए बिना इस हिंसक समाज में सभ्य बने रह सकता है? क्या पैसा केवल एक विलासिता है, या यह वास्तव में हिंसा का ही एक संगठित, अनुशासित और दीर्घकालिक रूप है जो बिना खून बहाए जीवन को नियंत्रित कर लेता है? क्या इस संसार में जीवन-निर्वाह बिना हिंसा किए संभव नहीं है?
‘प्रतिदंड’ इन्हीं प्रश्नों के बीच खड़ा एक ऐसा उपन्यास है, जो पाठक को केवल एक कहानी का साक्षी नहीं बनाता, बल्कि उसे एक गहरी और रहस्यमयी यात्रा पर ले जाता है। यह प्रतिशोध की कोई साधारण कथा नहीं है; यह उस अदृश्य संघर्ष का दस्तावेज़ है जहाँ इंसान जीवित रहने के लिए अपने ही भीतर एक नए और अधिक अचूक व्यक्तित्व को जन्म देता है।
कहानी की धुरी है अलंकृता। कभी अपने अस्तित्व को मिटा दिए जाने के डर से सहमी एक साधारण युवती, जो जीवन के अनुभवों की भट्टी में तपकर एक ऐसी ठंडी, निर्भीक और अचूक रणनीतिकार में बदल जाती है जिसकी थाह पाना किसी के बस की बात नहीं है। वह शतरंज की बिसात पर उस जटिल और आक्रामक व्यूह की तरह आगे बढ़ती है, जहाँ हर चाल शांत और मासूम दिखती है, लेकिन उसका फंदा पीछे खड़े शत्रुओं का दम घोटने के लिए पर्याप्त होता है।
इस संघर्ष के समानांतर चलती है एक माँ की मौन पर गहरी परछाई—आराधना। गृहस्थी की सुघड़ता के पीछे छिपी एक ऐसी भयानक और अडिग ममता, जो अपनी संतान के अतीत के जख्मों को मिटाने के लिए खुद चुपचाप काल बनकर खड़ी हो सकती है। जब व्यक्तिगत न्याय और सामूहिक अस्तित्व का सवाल टकराता है, तो नैतिकता और अनैतिकता के बीच की रेखाएँ धुंधली पड़ जाती हैं।
‘प्रतिदंड’ समाज के उन गहरे और स्याह कोनों में झाँकता है जहाँ सत्ता, पैसा और संगठित शक्ति कमज़ोरों की छाती पर पैर रखकर खड़ी होती है। लेकिन जब वही शोषित कमज़ोर अपनी सामूहिक आस्था को हथियार बना लेते हैं, तब बड़ी से बड़ी राजनैतिक सत्ताएँ और अपराधी साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढहने लगते हैं। शह और मात की राजनैतिक बिसात पर आधारित यह उपन्यास आपको एक ऐसे यथार्थ से परिचित कराएगा जिसे हम अक्सर अपनी सुविधानुसार अनदेखा कर देते हैं।
…और इन सबके बीच दो दशकों से अदृश्य बह रही है एक अत्यंत कोमल, निष्काम और अनाम प्रेम की अविरल धारा। क्या बीस वर्षों का विछोह एक अनाम सत्य की खोज में सफल हो पाएगा? क्या अतीत की बेड़ियाँ आज के सुकून को निगल जाएँगी या ‘प्रतिदंड’ का यह खांडव-दहन अंततः एक नया ‘इंद्रप्रस्थ’ खड़ा करेगा?
‘प्रतिदंड’ एक ऐसा गहन अनुभव है जो आपको मानवीय गरिमा, न्याय की भयानक सीमा और प्रेम की पवित्रता के उस शिखर पर ले जाता है जहाँ पहुँचकर हर पाठक के मन का द्वंद्व शांत हो जाता है। इसकी भाषा में एक ऐसा संगीतमय ठहराव है, जो सीधे दिल में उतर जाता है।
यह पुस्तक उनके लिए है जो केवल पढ़ते नहीं, बल्कि पात्रों के साथ जीते हैं, उनकी साँसों की गर्माहट को महसूस करते हैं और बंद किताबों के बाद भी उनके विचारों के साथ जागते रहते हैं।
आज ही अपनी प्रति सुरक्षित करें और इस असाधारण यात्रा का हिस्सा बनें!

About the Author 

अनिमेष अनंत स्वतंत्र लेखक और उपन्यासकार हैं। मानवीय मनोविज्ञान की परतों को खोलना, रहस्यों को बुनना और जटिल कथा-संरचना तैयार करना उनकी लेखनी की मुख्य विशेषता है। 'वज़ीर: मोहरा' से पूर्व उनकी बहुप्रशंसित कृति 'संदेश: उपन्यास एवं कहानी संग्रह' प्रकाशित हो चुकी है।

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