Classic Shelf
अधूरी रोशनी का रथ - एक पुत्र, एक पिता और कृष्ण का संवाद | Adhoori Roshni Ka Rath - Ek Putra, Ek Pita Aur Krishna Ka Samvaad
अधूरी रोशनी का रथ - एक पुत्र, एक पिता और कृष्ण का संवाद | Adhoori Roshni Ka Rath - Ek Putra, Ek Pita Aur Krishna Ka Samvaad
Couldn't load pickup availability
About The Book
'अधूरी रोशनी का रथ’ एक पुत्र की उस यात्रा का काव्यात्मक आख्यान है, जो अपने पिता को खोने के बाद शोक, अकेलेपन, संघर्ष और जीवन के अर्थ की तलाश से गुजरता है। यह केवल एक पिता की मृत्यु की कहानी नहीं, बल्कि उस बेटे के भीतर चलने वाले उन प्रश्नों की कथा है, जिनका उत्तर उसे वर्षों तक नहीं मिलता।
पिता के जाने के बाद संसार अपनी गति से चलता रहता है, जबकि उसके लिए समय जैसे एक क्षण में ठहर जाता है। घर की खाली कुर्सी, पिता की तस्वीर, उनकी आवाज़ की स्मृति और अधूरे रह गए सपने उसके जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। इसी शोक के बीच उसे पढ़ाई, जिम्मेदारियों, आर्थिक चिंताओं, परीक्षा, असफलताओं, भविष्य की अनिश्चितता और अपने अस्तित्व से जुड़े संघर्षों का सामना करना पड़ता है।
इन संघर्षों के बीच उसका संवाद कृष्ण से शुरू होता है। यह संवाद किसी धार्मिक उपदेश या शास्त्रीय पुनर्कथन के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य और उसके भीतर के प्रश्नों के बीच संवाद के रूप में सामने आता है, जो मृत्यु, कर्म, भय, मोह, कर्तव्य और जीवन के अर्थ को समझना चाहता है।
कृष्ण उसे कोई आसान उत्तर नहीं देते। वे उसे यह देखने की दृष्टि देते हैं कि हर प्रश्न का उत्तर मिलना आवश्यक नहीं, लेकिन बचे हुए जीवन के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी बनी रहती है।
‘अधूरी रोशनी का रथ’ अंततः शोक को मिटाने की नहीं, उसके साथ जीना सीखने की कहानी है, जहाँ पिता की अनुपस्थिति धीरे-धीरे एक ऐसी स्मृति में बदलती है, जो पुत्र को रोकती नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की रोशनी देती है।
About The Author
मणिकांत कुमार कुशवाहा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से कोरियाई भाषा एवं साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले लेखक हैं। हिंदी, भोजपुरी, अंग्रेज़ी और कोरियाई भाषाओं से उनका जुड़ाव रहा है। उनके लिए लेखन केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं को और जीवन को समझने की एक प्रक्रिया है।
‘अधूरी रोशनी का रथ’ उनकी मौलिक हिंदी काव्य-कृति है। पिता की स्मृति और उनके निधन के बाद के आत्ममंथन से प्रेरित यह रचना व्यक्तिगत वियोग को कर्म, संघर्ष, कर्तव्य और जीवन के अर्थ की व्यापक खोज से जोड़ती है।
उनकी लेखकीय दृष्टि में साहित्य का उद्देश्य हमेशा उत्तर देना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को स्वर देना भी है, जिन्हें मनुष्य अक्सर अपने भीतर मौन रखता है।
Share
